कभी सड़कों पर बिताती थी रातें, अब बनी देश की पहली ट्रांसजेंडर जज, देती है लोगों को न्याय

हाय! हाय! या तेज तालियों की आवाज़ को हम सभी ने कभी न कभी ,कहीं न कहीं अवश्य सुना है| चाहे वो बस हो या ट्रेन, गलियाँ हो या किसी का घर, बस स्टॉप हो या रेलवे स्टेशन| इस आवाज़ को सुनकर लोग आमतौर पर हंसने लगते हैं या हीनभावना के कारण अपना मुंह सिकोड़ लेते हैं| क्यूँ? इसका उत्तर है “किन्नर” या “हिजड़ा”| किन्नर, हमारे समाज का एक ऐसा शब्द है जिसको लोग आज के समय में भी गाली समझते हैं| वैसे तो भारत में किन्नरों के अधिकारों के लिए कानून बना दिये गए हैं परंतु वो कानूनी अधिकार भी किन्नरों को इज्जत का अधिकार नहीं दे पाये| परंतु आज हम आपको एक ऐसे किन्नर के बारें में बताने जा रहे हैं जिन्होंने समाज का सामना डट कर किया और अपनी मेहनत और संघर्ष के साथ बन गईं देश की पहली ट्रान्सजेंडर जज|

जी हाँ हम बात कर रहे हैं जोयिता मंडल की| जोयिता बंगाल की रहने वाली हैं साथ ही वह एक किन्नर हैं| जोयिता ने अपने हुनर से उन सभी को करारा जवाब दिया है जो लोग किन्नरों को समाज का अंग नहीं समझते| जोयिता आज पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर में लोक अदालत की जज और साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता हैं| बेशक ये सुनने या पढ़ने में बहुत ही आम लगेगा लेकिन एक किन्नर के नजरिए से सोचें तो ये सफर काटों से भरा था जिसको पार कर जोयिता ने अपनी एक अलग पहचान बनाई|

किन्नर होने के कारण परिवार ने घर से निकाला,फ़ुटपाथ पर गुजरी रातें

किन्नर जब ताली बजाते हैं तो उनके मुंह से दुआएं ही निकलती हैं, परंतु उन तालियों की आवाज़ के पीछे उनके अधिकारों की चीख कोई नहीं सुन पाता| जोयिता को बचपन से ही लड़कियों की तरह कपड़े पहनने, उनकी तरह चलने का शौक था| लेकिन उनके घरवालों को यह गवारा नहीं था क्यूंकि उनका परिवार एक “समाज” में रहता है, इसलिए जोयिता को घर से निकाल दिया गया| जोयिता ने बताया कि जब उन्हें घर से निकाला गया तो उन्हें रात में फ़ुटपाथ पर सोना पड़ता था क्यूंकि लोग उनके किन्नर होने के कारण उन्हें होटल में कमरा तक नहीं दिया करते थे| यहाँ तक कि जब वह खाना लेने जाती थी तो लोग उनसे कहते थे कि हमें दुआएं दो| कॉलेज में भी जोयिता पर फब्तियाँ कसी जाती थीं जिसके कारण उन्हें अपनी पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी| जोयिता ने बताया कि अपना पेट भरने और गुजारा चलाने के लिए वह कभी भीख मांगकर तो कभी नाचकर पैसे कमाती थीं|

2014 के फैसले ने बढ़ाया हौसला

जोयिता ने बताया कि जब वह अपना पहचान पत्र बनवाने गईं तो उन्हें मना कर दिया गया और कहा गया कि ‘तुम मत जाओ उधर, वहाँ तुम जैसे लोग नहीं जाते’| इस वाक्य ने जोयिता को अंदर से झकझोर दिया परंतु जोयिता ने हार नहीं मानी वह संघर्ष करती रहीं| उसके कुछ समय बाद 2014 में सुप्रीम कोर्ट का ट्रान्सजेंडरों के हित में फैसला आता है और इस फैसले से जोयिता और मजबूत बन जाती हैं|

जोयिता ने अपना पहचान पत्र बनवाया और अपने जिले में वह पहली ट्रान्सजेंडर थीं जिन्होंने अपना पहचान पत्र बनवाया| आज जोयिता एक जज के साथ साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं वह LGBTQ के अधिकारों के लिए कढ़े प्रयास कर रही हैं| जोयिता ने “dinajpur Nuton Alo” और “nai roshani” को शुरू किया है|

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